Saturday, August 26, 2017

कसूर

कसूर
अक्सर सोचता हूँ क्या कसूर हैं उस गरीब बच्चे का जो पढ़ नहीं पाता
क्या कसूर हैं उसका जो वो सड़क किनारे हैं सोता
क्या कसूर हैं उसका जो वो दो वक़्त की रोटी नहीं खा पाता
आखिर क्या कसूर हैं उसका जो वो अपना तन भी नहीं ढक पाता
आखिर क्या कसूर हैं उसका जो वो हँस नहीं पाता
आखिर क्या कसूर हैं उसका जो वो ताने सुनता जाता
आखिर क्या कसूर हैं उसका जो वो दिन रात चलता जाता
आखिर क्या कसूर हैं उसका जो वो गन्दगी मैं हैं रहता
आखिर क्यों वो कई दफा रोता हैं
क्योंकि
अक्सर सोचता हैं वो भी
मैं भी पढ़ने जाऊँ
मैं भी अपने घर मैं सोऊँ
मुझे भी अच्छा खाना मिले
पहनने को अच्छे कपडे मिले
मैं भी खेलू दोस्त बनाऊँ
उनके साथ मस्ती करुँ हँसू
कोई मुझे गन्दी गाली ना  दे
छोटी नजरो से ना देखें
मैं भी आराम करू सोऊं
एक अच्छी जगह पर रहूँ
आखिर क्या कसूर हैं मेरा ?

क्या कसूर  ?
कोई बतायें तो
क्या गरीब होना गुनाह हैं ?
या गरीब के  घर मैं पैदा होना ?
और क्यों ?
  मुझे  भी पढ़ना हैं
वो सब करना हैं जो दूसरे   करते हैं
 आखिर क्यों नहीं कर सकता मैं ये सब
कोई  बताये मुझे कसूर मेरा ?

लेलेखक विरेन्द्र  भारती
8561887634

गजल एक भारती