Thursday, August 31, 2017

हुनर विरेन्द्र भारती


जिंदा कर तू अपने उस हुनर को ।
जो ले जाए तुझे शिखर को ।।

जिंदा कर तू अपने उस हुनर को ।
जो झुकने ना दे तेरे सिर को ।।

अरे मर्द है तो मर्द सी बात कर ।
यूँ प्यार व्यार के चक्कर में जिंदगी बर्बाद ना कर ।।

जिंदा कर तू अपने उस हुनर को ।
जो पहचान दिलाए तेरे सफर को ।।

जिंदा कर तू अपने उस हुनर को ।
जो संवारे तेरे व्यक्तित्व  को ।।

अरे जिंदा है तो मुर्दो सी बात ना कर ।
दूसरों के लिए भी कुछ  करामात कर ।।

जिंदा कर तू अपने  उस हुनर को ।
जो बनाएं नव तेरे जीवन  को  ।।

जिंदा कर तू खुद को ।
जिंदा कर तू अपने हुनर को । जिंदा कर ।।

लेखक विरेन्द्र  भारती 
8561887634

गजल एक भारती